जामा मस्जिद कहाँ है, इतिहास, बनावट एवं निर्माण व् कैसे जायें

जामा मस्जिद

जामा मस्जिद भारत की प्रसिद्ध मस्जिद में से एक है और यह पुरानी दिल्ली में स्थिति है।

तथा इस जामा मस्जिद की बनावट सभी मस्जिद की बनावट रूप – रेखा से अलग है, और यह जामा मस्जिद किसी की पहचान की मोहताज नही है।

इसकी अपनी ही मुगल बादशाह द्वारा बनाई गई पहचान इतिहास में बहुत ही सुनहरी अक्षरों में लिखी गई है जिसका विवरण विस्तार रूप से नीचे लिखा हुआ हैं। जो आपको जामा मस्जिद के बारे में विस्तार से उसमे हुए उतार चढ़ाव को बताता है।

मस्जिद की बनावट :

जामा मस्जिद नई दिल्ली में लाल किले से 500 मीटर की दूरी पर स्थित है।

और इसकी लम्बाई 800 मीटर हे और चौड़ाई 27 मीटर है, जामा मस्जिद में 3 गुंबद है और 2 मीनार है और मीनार की ऊंचाई 41 मीटर है। जो इसकी खूबसूरत को दूर से दर्शा देता है। जामा मस्जिद ऊंचाई पर बनी है जिससे वह दूर से ही अपना प्रकाश फैलाती हैं।

जामा मस्जिद में उपयोग की गई सामाग्री और निवेश :

मस्जिद में मुगल बादशा शाहजहाँ ने इसको बनाने में संगमर के पत्थर और बलुआ पत्थर इस्तेमाल करते हुए इसे निर्मित करवाया गया है। इसे बनाने में उस समय के लगभग 10 लाख रुपए का निवेश किया गया जिसके द्वारा इसकी खूबसूरती में चार चांद लगा दिए गए।

मुगल बादशाह शाहजहाँ द्वारा निर्माण :

जामा मस्जिद का निमार्ण मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा सन 1650 में शुरू कराया गया था इसे बनाने में 6 वर्ष की अवधी का समय लगा। क्योकिं इसमें बनी दीवारों और कक्ष में भारतीय शिल्प कलाकार द्वारा हस्त कलाओं का उपयोग हुआ है।

यह इतनी बड़ी है की इसमें ज्यादा से ज्यादा 24 से 25 हजार लोग नवाज़ अदा कर सकते हैं।

बादशाह चाहते थे वे ऐसी मस्जिद निर्माण कराए जो अलग और ऊंची हो जिसको देखने पर मन में खुदा के प्रती भावना उत्पन्न हो।

आप देखेंगे कि जामा मस्जिद लाल किले के सामने 500 मीटर की दूरी पर ही स्थित है इसका अपना अलग कारण है की मुगल बादशाह की चाह थी की खुदा की मस्जिद उनके घर के मुकाबले बहुत बड़ी हो।

जामा मस्जिद को भोजला नाम की एक पहाड़ी पर निर्मित कराया गया था इसका निर्माण 6 अक्टूबर 1650 से प्रारम्भ हो गया था और जामा मस्जिद के दोनो तरफा 41 मीटर ऊंची मीनार को स्थम्भित किया गया।

इसको निर्मित करने में कई टन संगमरमर और बलुआ पत्थर का इस्तेमाल हुआ है जब इसका निर्माण हुआ उस दौरान इस्लाम के वास्तु कला का उपयोग बहुत ही ज्यादा खासकर इमारतों को सुंदरता देने के लिए किया गया था।

जो यह दर्शाता है की यह इस्लाम धर्म से संबंधित है।

मस्जिद में नमाज़ :

आप देखेंगे कि वहाँ पर आए हुए मुस्लिम समाज के व्यक्ति जो हर शुक्रवार को नवाज़ अदा करने के लिए आते हैं उनके लिए काले रंग के चौकोर आकार के 299 बॉक्स का निर्माण हुआ।

जो नवाज़ अदा करने के लिए आए लोगो के लिए अधिक उपयोगी है तथा एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है की पहले इस मस्जिद का नाम मस्जिदे जहाँनुमा था परंतु इसका आकार अन्य मस्जिदों से बहुत बड़ा था जिसके कारण यह पर बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ उमड़ती है इस प्रकार बाद में इसको जामा मस्जिद नाम दिया गया था जो आज भी इस नाम से विख्यात है।

मुगल बादशाह चाहुते थे कि वह अपने शासन काल में वह भारत को विश्व का बड़ा और खूबसूरत देश बनाएगा तथा मस्जिद को सुन्दर बनाने के लिए हिंदू तथा जैन की वास्तू कलाओं का भी उपयोग कर लगभग 260 स्तंभ को बनाया गया है।

मस्जिद की कलाकृति :

जामा मस्जिद मुगल शासक बादशाह शाहजहाँ द्वारा खर्चीली आखरी ऐतिहासिक ईमारत है। इस मस्जिद को बनाने में लगभग 5000 शिल्पकार कारीगरों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया था।

बादशाह चाहते थे की इस खास मस्जिद के ईमाम भी अलग और ख़ास होना चाहिए जिनकी खोज के लिए बादशाह ने दूर – दूर तक तलाश की जो उज़्बेकिस्तान के शहर बुखारा में मिले जिनका नाम सैयद अब्दुल गफूर शाह था।

जामा मस्जिद में प्रवेश करने के लिए उत्तर और दक्षिण द्वार का इस्तेमाल करते है। इसमें 11 मेहूराब हैं जिनमें से मध्य मेहराब अन्य मेहराब से बड़ा है।

ऐसा माना गया है की इस मस्जिद में कई प्राचीन अवशेष है जिनमे से एक यह है कि हिरण की खाल पर लिखीं कुरान की परती उपलब्ध हैं। आने वाले पर्यटक उत्तरी द्वार से पोशाक को किराए से प्राप्त कर सकते हैं और जामा मस्जिद में फोटो सूट कराने के लिए आपको अथॉरिटी को पैसे अदा करना ज़रूरी होता है।

आसपास के बाज़ार :

जामा मस्जिद के निकट लगी बाज़ार वहाँ आए हुए पर्यटक के लिए भ्रमण के साथ – साथ भारत की हस्त शिल्प कला का आनंद लेते हैं। और विभिन्न प्रकार की वस्तु खरीदने का अनुभव प्राप्त करते है या फिर वे वस्तुए हिन्दू या मुस्लिम के कलाकारों के हुनर को दर्शाती हो।

जामा मस्जिद का दौरा :

इस जामा मस्जिद को देखने के लिए लोग विभिन्न स्थानों से वाहनों का इस्तेमाल कर बड़ी मात्रा में लोगों की भीड़ उमड़ती है चाहे वह निजी या फिर सार्वजानिक वाहन का उपयोग क्यों न हो।

निजी वाहन :

निजी वाहन का उपयोग वहाँ की नक्काशी को देखने में बहुत सहायक होता है।

सार्वजनिक वाहन :

सार्वजनिक वाहन का उपयोग भले ही खर्च नुमा होता है परंतु इसके इस्तेमाल से मस्जिद को देखने के लिए पैदल यात्रा करनी पड़ती हैं जो आपके समय को नष्ट करता है।

सारांश :

जामा मस्जिद के भ्रमण के पश्चात् आपको बादशाह द्वारा बनाए गई सभी सुन्दर और आकर्षक ईमारत में एक बात सामान दिखाई देती हैं।

वह यह है कि सभी ऐतिहासिक इमारतों की नक्काशी में इस्लाम की कलाकारी फूट- फूट कर निखरती है और अपना प्रकाश फैलाकर भारत की इन सभी इमारतों का इतिहास बताती हैं।

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अंतिम शब्द :

आशा करता हूँ की आपको जामा मस्जिद के बारें में दिया गया जानकारी सही लगी होगी।

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